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मण्डल आयोग (Mandal Commission): भारतीय सामाजिक न्याय की सबसे निर्णायक कहानी
भूमिका
भारत की सामाजिक-राजनीतिक संरचना को गहराई से प्रभावित करने वाली जिन कुछ ऐतिहासिक घटनाओं ने आधुनिक भारत की दिशा बदली, उनमें मण्डल आयोग का स्थान सर्वोपरि है। यह केवल एक सरकारी आयोग नहीं था, बल्कि सदियों से चली आ रही सामाजिक असमानताओं, जातिगत भेदभाव और अवसरों की विषमता पर सीधा हस्तक्षेप था। मण्डल आयोग ने “आरक्षण” को एक सीमित प्रशासनिक नीति से निकालकर सामाजिक न्याय के व्यापक विमर्श में बदल दिया।
इस विस्तृत लेख में हम मण्डल आयोग के गठन से लेकर उसकी सिफारिशों, समर्थन-विरोध, राजनीतिक उथल-पुथल, सामाजिक प्रभाव, आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों के जीवन-परिचय और आज तक पड़ने वाले प्रभावों का सम्पूर्ण, क्रमबद्ध और विश्लेषणात्मक अध्ययन करेंगे।
1. मण्डल आयोग क्या था?
मण्डल आयोग का औपचारिक नाम था— सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की पहचान हेतु आयोग (Socially and Educationally Backward Classes Commission – SEBC)।
इसका उद्देश्य था यह पता लगाना कि भारत में कौन-कौन से समुदाय सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े हैं तथा उन्हें मुख्यधारा में लाने के लिए राज्य को क्या कदम उठाने चाहिए।
2. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: आयोग की आवश्यकता क्यों पड़ी?
2.1 औपनिवेशिक काल और जातिगत संरचना
ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीय समाज पहले से मौजूद जातिगत ढांचे में जकड़ा हुआ था। उच्च जातियों का प्रशासन, शिक्षा और नौकरियों पर वर्चस्व था, जबकि बहुसंख्यक जनसंख्या—विशेषकर शूद्र और अति-शूद्र—संसाधनों से वंचित थी।
2.2 स्वतंत्रता के बाद संविधान और आरक्षण
भारत के संविधान ने समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14) और पिछड़े वर्गों के लिए विशेष प्रावधान (अनुच्छेद 15(4), 16(4)) दिए।
अनुसूचित जाति (SC)
अनुसूचित जनजाति (ST)
इन वर्गों के लिए आरक्षण सुनिश्चित किया गया, परंतु अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की कोई स्पष्ट राष्ट्रीय सूची नहीं थी।
2.3 काका कालेलकर आयोग (1953)
पहला पिछड़ा वर्ग आयोग काका कालेलकर की अध्यक्षता में बना, लेकिन उसकी सिफारिशें पूरी तरह लागू नहीं की गईं। कारण था—
जाति आधारित पहचान पर राजनीतिक असहमति
ठोस आंकड़ों का अभाव
यहीं से एक नए, अधिक वैज्ञानिक और विस्तृत आयोग की मांग उठी।
3. मण्डल आयोग का गठन
3.1 आयोग की स्थापना
1 जनवरी 1979 को तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई की सरकार ने मण्डल आयोग का गठन किया।
3.2 अध्यक्ष की नियुक्ति
आयोग के अध्यक्ष बनाए गए—
बिनदेश्वरी प्रसाद मण्डल
उनके नाम पर ही यह आयोग “मण्डल आयोग” कहलाया।
4. मण्डल आयोग के अध्यक्ष: बिनदेश्वरी प्रसाद मण्डल (B. P. Mandal)
4.1 प्रारंभिक जीवन
जन्म: 25 अगस्त 1918, बिहार
स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भागीदारी
समाजवादी विचारधारा से प्रभावित
4.2 राजनीतिक जीवन
बिहार के मंत्री
सांसद
पिछड़े वर्गों के सामाजिक उत्थान के प्रबल समर्थक
4.3 विचारधारा
बी. पी. मण्डल मानते थे कि
“राजनीतिक स्वतंत्रता तब तक अधूरी है, जब तक सामाजिक और आर्थिक न्याय न मिले।”
उनका विश्वास था कि बिना संरचनात्मक सुधार के समान अवसर केवल एक भ्रम रहेगा।
5. मण्डल आयोग के सदस्य (सदस्यगण का परिचय)
मण्डल आयोग में कुल पांच सदस्य थे—
बी. पी. मण्डल (अध्यक्ष)
एल. आर. नायक – सामाजिक मामलों के विशेषज्ञ
एस. एम. हुसैन – प्रशासनिक अनुभव
बी. के. सहरिया – सांख्यिकी एवं सामाजिक अध्ययन
आर. आर. राव – अनुसंधान और नीति विश्लेषण
इन सभी सदस्यों ने देश के कोने-कोने में जाकर आंकड़े जुटाए, जनसुनवाई की और सामाजिक वास्तविकताओं को समझा।
6. आयोग की कार्यप्रणाली: मण्डल आयोग ने कैसे काम किया?
6.1 डेटा संग्रह
1931 की जाति जनगणना
1961 की जनगणना के पूरक आंकड़े
राज्यों से प्राप्त सूचनाएँ
6.2 पिछड़ेपन के मापदंड
मण्डल आयोग ने 11 मापदंड तय किए, जो तीन श्रेणियों में थे—
(क) सामाजिक मापदंड
सामाजिक भेदभाव
जाति आधारित पेशे
(ख) शैक्षणिक मापदंड
साक्षरता दर
स्कूल ड्रॉपआउट
(ग) आर्थिक मापदंड
भूमि स्वामित्व
आवास की स्थिति
7. मण्डल आयोग की प्रमुख सिफारिशें
मण्डल आयोग की सिफारिशें: विस्तृत, तथ्यात्मक और विश्लेषणात्मक विवेचना
मण्डल आयोग की सिफारिशें भारतीय संविधान के सामाजिक न्याय दर्शन का सबसे ठोस और प्रभावशाली व्यावहारिक रूप थीं। इन सिफारिशों का उद्देश्य केवल सरकारी नौकरियों में आरक्षण देना नहीं था, बल्कि सदियों से चली आ रही सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक विषमता को संरचनात्मक रूप से समाप्त करना था।
नीचे मण्डल आयोग की सभी प्रमुख एवं गौण सिफारिशों पर विस्तृत और क्रमबद्ध प्रकाश डाला जा रहा है।
1. अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की पहचान संबंधी सिफारिशें
1.1 OBC की परिभाषा
मण्डल आयोग ने स्पष्ट किया कि:
“अन्य पिछड़ा वर्ग वे सामाजिक समूह हैं जो ऐतिहासिक रूप से सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े रहे हैं, और जिनका पर्याप्त प्रतिनिधित्व सत्ता, शिक्षा और रोजगार में नहीं है।”
यह परिभाषा केवल आर्थिक गरीबी तक सीमित नहीं थी, बल्कि सामाजिक बहिष्करण को मूल कारण मानती थी।
1.2 पिछड़ेपन के 11 मापदंड (Criteria)
मण्डल आयोग ने OBC की पहचान के लिए 11 वैज्ञानिक मापदंड तय किए, जिन्हें तीन श्रेणियों में बाँटा गया:
(क) सामाजिक मापदंड (Social Indicators)
समाज में निम्न सामाजिक प्रतिष्ठा
जाति आधारित पारंपरिक पेशे
सामाजिक भेदभाव और छुआछूत जैसी स्थितियाँ
महिलाओं की अल्प आयु में विवाह
समाज में निम्न सामाजिक प्रतिष्ठा
जाति आधारित पारंपरिक पेशे
सामाजिक भेदभाव और छुआछूत जैसी स्थितियाँ
महिलाओं की अल्प आयु में विवाह
(ख) शैक्षणिक मापदंड (Educational Indicators)
साक्षरता दर राष्ट्रीय औसत से कम
स्कूल ड्रॉपआउट की अधिक दर
उच्च शिक्षा में न्यूनतम भागीदारी
साक्षरता दर राष्ट्रीय औसत से कम
स्कूल ड्रॉपआउट की अधिक दर
उच्च शिक्षा में न्यूनतम भागीदारी
(ग) आर्थिक मापदंड (Economic Indicators)
भूमि स्वामित्व का अभाव
कच्चे मकानों में निवास
परिवार की आजीविका श्रम आधारित होना
उपभोक्ता संसाधनों की कमी
भूमि स्वामित्व का अभाव
कच्चे मकानों में निवास
परिवार की आजीविका श्रम आधारित होना
उपभोक्ता संसाधनों की कमी
➡️ यदि कोई जाति/समुदाय इन मापदंडों में से आधे से अधिक पर खरा उतरता था, तो उसे OBC माना गया।
2. OBC जनसंख्या से संबंधित सिफारिश
2.1 OBC की जनसंख्या का अनुमान
मण्डल आयोग ने निष्कर्ष निकाला कि:
भारत की लगभग 52% जनसंख्या अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) में आती है।
यह आंकड़ा 1931 की जाति जनगणना, राज्य सरकारों के रिकॉर्ड और सामाजिक सर्वेक्षणों पर आधारित था।
3. आरक्षण संबंधी सबसे महत्वपूर्ण सिफारिश
3.1 केंद्र सरकार की नौकरियों में 27% आरक्षण
मण्डल आयोग की सबसे चर्चित सिफारिश थी:
केंद्र सरकार की सभी सेवाओं और पदों में OBC के लिए 27% आरक्षण।
कारण:
SC/ST के लिए पहले से 22.5% आरक्षण लागू था
कुल आरक्षण 49.5% रखा गया, जिससे 50% की संवैधानिक सीमा का उल्लंघन न हो
SC/ST के लिए पहले से 22.5% आरक्षण लागू था
कुल आरक्षण 49.5% रखा गया, जिससे 50% की संवैधानिक सीमा का उल्लंघन न हो
➡️ इस प्रकार सामाजिक संतुलन बनाए रखने का प्रयास किया गया।
3.2 सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम (PSUs)
मण्डल आयोग ने सिफारिश की कि:
सरकारी कंपनियों
सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों
स्वायत्त संस्थानों
में भी OBC आरक्षण लागू किया जाए।
4. शिक्षा क्षेत्र से जुड़ी सिफारिशें
4.1 उच्च शिक्षण संस्थानों में आरक्षण
मण्डल आयोग ने कहा कि:
विश्वविद्यालयों
इंजीनियरिंग कॉलेजों
मेडिकल कॉलेजों
में OBC छात्रों के लिए आरक्षण अनिवार्य किया जाए।
(हालाँकि यह सिफारिश पूर्ण रूप से बाद में 2006–2008 के दौरान लागू हुई)
4.2 छात्रवृत्ति और वित्तीय सहायता
OBC छात्रों के लिए:
विशेष छात्रवृत्ति योजनाएँ
हॉस्टल सुविधा
मुफ्त या रियायती शिक्षा
की सिफारिश की गई।
5. प्रशासनिक और संस्थागत सिफारिशें
5.1 स्थायी पिछड़ा वर्ग आयोग
मण्डल आयोग ने सुझाव दिया कि:
एक स्थायी राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग बनाया जाए
जो समय-समय पर OBC सूची की समीक्षा करे
➡️ आगे चलकर यही अवधारणा राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (NCBC) के रूप में विकसित हुई।
5.2 डेटा संग्रह और निगरानी
OBC की सामाजिक-आर्थिक स्थिति का नियमित सर्वे
नीति-निर्माण में आँकड़ों का उपयोग
OBC की सामाजिक-आर्थिक स्थिति का नियमित सर्वे
नीति-निर्माण में आँकड़ों का उपयोग
6. महिला पिछड़े वर्गों के लिए विशेष सिफारिशें
मण्डल आयोग ने माना कि:
“पिछड़े वर्गों की महिलाएँ दोहरी वंचना (जाति + लिंग) का शिकार हैं।”
सिफारिशें:
महिला OBC के लिए विशेष शैक्षणिक प्रोत्साहन
तकनीकी एवं व्यावसायिक प्रशिक्षण
महिला OBC के लिए विशेष शैक्षणिक प्रोत्साहन
तकनीकी एवं व्यावसायिक प्रशिक्षण
7. ग्रामीण और कारीगर वर्ग के लिए सिफारिशें
पारंपरिक कारीगर जातियों के लिए
कौशल उन्नयन
सस्ते ऋण
विपणन सुविधा
पारंपरिक कारीगर जातियों के लिए
कौशल उन्नयन
सस्ते ऋण
विपणन सुविधा
➡️ उद्देश्य: केवल नौकरी नहीं, आर्थिक आत्मनिर्भरता।
8. मण्डल आयोग की सिफारिशों का राजनीतिक कार्यान्वयन
8.1 1990 में घोषणा
प्रधानमंत्री वी. पी. सिंह ने 1990 में:
OBC के लिए 27% आरक्षण लागू करने की घोषणा की
यह भारतीय राजनीति का ऐतिहासिक मोड़ साबित हुआ।
8.2 न्यायिक पुष्टि
इंद्रा साहनी बनाम भारत सरकार (1992) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने:
OBC आरक्षण को वैध ठहराया
50% की सीमा तय की
क्रीमी लेयर की अवधारणा दी
➡️ इससे मण्डल आयोग की सिफारिशें संवैधानिक रूप से मजबूत हुईं।
9. क्रीमी लेयर: मण्डल आयोग की भावना का विस्तार
हालाँकि “क्रीमी लेयर” शब्द आयोग की मूल रिपोर्ट में स्पष्ट नहीं था, लेकिन उसकी भावना यही थी कि:
सामाजिक रूप से उन्नत OBC को लाभ से अलग रखा जाए
लाभ वास्तव में पिछड़े लोगों तक पहुँचे
10. सिफारिशों का समग्र मूल्यांकन
सकारात्मक प्रभाव
सत्ता और प्रशासन में OBC की भागीदारी बढ़ी
लोकतंत्र का सामाजिक विस्तार
शिक्षा तक पहुँच में सुधार
सत्ता और प्रशासन में OBC की भागीदारी बढ़ी
लोकतंत्र का सामाजिक विस्तार
शिक्षा तक पहुँच में सुधार
आलोचनाएँ
जातिगत राजनीति को बढ़ावा
मेरिट बनाम आरक्षण विवाद
जातिगत राजनीति को बढ़ावा
मेरिट बनाम आरक्षण विवाद
➡️ फिर भी, यह निर्विवाद है कि बिना इन सिफारिशों के समान अवसर की कल्पना अधूरी रहती।
निष्कर्ष
मण्डल आयोग की सिफारिशें केवल 27% आरक्षण तक सीमित नहीं थीं, बल्कि वे एक सम्पूर्ण सामाजिक पुनर्गठन योजना थीं।
इनका लक्ष्य था—
ऐतिहासिक अन्याय को स्वीकार करना, और लोकतंत्र को सामाजिक आधार देना।
आज भी OBC आरक्षण, जाति जनगणना और सामाजिक न्याय की बहस में मण्डल आयोग की सिफारिशें मार्गदर्शक स्तंभ बनी हुई हैं।
8. मण्डल आयोग के पक्ष में तर्क (समर्थक कौन थे?)
8.1 सामाजिक न्याय के समर्थक
समाजवादी नेता
पिछड़े वर्गों के संगठन
ग्रामीण और निम्न-मध्यवर्ग
8.2 प्रमुख राजनीतिक समर्थक
वी. पी. सिंह
जनता दल
बाद में क्षेत्रीय दल (राजद, सपा, जदयू आदि)
समर्थकों का कहना था कि
“आरक्षण कोई दया नहीं, बल्कि ऐतिहासिक अन्याय का प्रतिकार है।”
9. मण्डल आयोग का विरोध (विपक्ष में कौन थे?)
9.1 शहरी मध्यम वर्ग
सरकारी नौकरियों में अवसर घटने की आशंका
मेरिट बनाम आरक्षण की बहस
9.2 छात्र आंदोलन (1990)
आत्मदाह की घटनाएँ
बड़े पैमाने पर प्रदर्शन
9.3 राजनीतिक विरोध
कुछ कांग्रेस नेता
दक्षिणपंथी संगठन
विरोधियों का तर्क था कि
“जाति के आधार पर आरक्षण समाज को और विभाजित करेगा।”
10. मण्डल आयोग रिपोर्ट और राजनीतिक विस्फोट (1990)
अब हम यहाँ पर मण्डल आयोग के वजह से देश मे जो राजनैतिक और सामाजिक विस्फोट हूएं उनके ऊपर एक विस्तृत लेख प्रस्तुत कर रहा हूँ।
मण्डल आयोग रिपोर्ट और राजनीतिक विस्फोट (1990): भारतीय लोकतंत्र का निर्णायक मोड़
भूमिका
सन् 1990 भारतीय राजनीति और समाज के इतिहास में एक ऐसा वर्ष बनकर उभरा, जिसने न केवल सत्ता-संतुलन को बदला बल्कि लोकतंत्र की सामाजिक संरचना को भी नई दिशा दी। यह वर्ष मण्डल आयोग की रिपोर्ट को लागू किए जाने के कारण जाना जाता है, जिसने देशव्यापी आंदोलन, हिंसा, आत्मदाह, राजनीतिक टूट-फूट और सामाजिक ध्रुवीकरण को जन्म दिया।
मण्डल आयोग की रिपोर्ट पहले ही 1980 में प्रस्तुत हो चुकी थी, परंतु उसका वास्तविक प्रभाव तब सामने आया जब इसे 1990 में लागू करने की घोषणा की गई। यही घोषणा “मण्डल आंदोलन” और उससे जुड़े राजनीतिक विस्फोट का कारण बनी।
1. मण्डल आयोग रिपोर्ट: संक्षिप्त पृष्ठभूमि
मण्डल आयोग की स्थापना 1979 में हुई थी, जिसकी अध्यक्षता बिनदेश्वरी प्रसाद मण्डल ने की। आयोग का उद्देश्य था—
सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (OBC) की पहचान
उनके उत्थान के लिए ठोस सिफारिशें देना
1980 में आयोग ने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी, जिसमें यह निष्कर्ष निकाला गया कि भारत की लगभग 52% जनसंख्या OBC है और उन्हें 27% आरक्षण दिया जाना चाहिए।
हालाँकि, राजनीतिक अस्थिरता के कारण यह रिपोर्ट लगभग एक दशक तक ठंडे बस्ते में पड़ी रही।
2. 1989–90 की राजनीतिक पृष्ठभूमि
2.1 जनता दल सरकार का गठन
1989 के आम चुनावों के बाद देश में वी. पी. सिंह के नेतृत्व में जनता दल सरकार बनी। यह सरकार—
कांग्रेस विरोधी गठबंधन
पिछड़े वर्गों और क्षेत्रीय शक्तियों के समर्थन से बनी थी
सरकार को सामाजिक न्याय के एजेंडे पर आगे बढ़ना राजनीतिक और वैचारिक—दोनों दृष्टि से आवश्यक लगा।
3. 7 अगस्त 1990: ऐतिहासिक घोषणा
7 अगस्त 1990 को प्रधानमंत्री वी. पी. सिंह ने लोकसभा में घोषणा की—
“केंद्र सरकार की सेवाओं में अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 27% आरक्षण लागू किया जाएगा।”
यही घोषणा राजनीतिक विस्फोट का तात्कालिक कारण बनी।
4. देशव्यापी प्रतिक्रिया: समर्थन और विरोध
4.1 समर्थन: सामाजिक न्याय की जीत
OBC समुदायों में व्यापक उत्साह
ग्रामीण भारत और पिछड़े वर्गों ने इसे ऐतिहासिक न्याय माना
समाजवादी और क्षेत्रीय दलों ने खुला समर्थन दिया
यह वर्ग पहली बार सत्ता-तंत्र में अपने प्रतिनिधित्व की वास्तविक संभावना देख रहा था।
4.2 विरोध: शहरी भारत का उबाल
दूसरी ओर—
शहरी मध्यम वर्ग
उच्च जातियों के छात्र
प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवा
इस फैसले के खिलाफ सड़कों पर उतर आए।
प्रमुख तर्क:
“मेरिट की हत्या”
“योग्यता बनाम आरक्षण”
“जाति आधारित विभाजन”
5. छात्र आंदोलन और आत्मदाह की घटनाएँ
1990 का मण्डल विरोध आंदोलन विशेष रूप से छात्र आंदोलनों के लिए जाना जाता है।
दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान में व्यापक प्रदर्शन
कई छात्रों द्वारा आत्मदाह का प्रयास
मीडिया में झकझोर देने वाली तस्वीरें
इन घटनाओं ने पूरे देश को मानसिक रूप से झकझोर दिया और सरकार पर जबरदस्त दबाव बनाया।
6. राजनीतिक दलों की भूमिका और टूट-फूट
6.1 भाजपा की रणनीति
शुरुआत में भाजपा ने सरकार को बाहरी समर्थन दिया था, लेकिन—
मण्डल राजनीति से उच्च जातियों में असंतोष
उसी समय उभरती राम जन्मभूमि राजनीति
ने राजनीतिक ध्रुवीकरण को नया मोड़ दिया।
6.2 सरकार का पतन
भाजपा ने समर्थन वापस लिया
जनता दल में आंतरिक मतभेद
1990 के अंत में वी. पी. सिंह सरकार गिर गई
➡️ मण्डल आयोग लागू करने वाली सरकार खुद सत्ता से बाहर हो गई, लेकिन मण्डल विचारधारा जीवित रही।
7. संसद, मीडिया और बौद्धिक बहस
7.1 संसद में बहस
तीखी भाषणबाजी
सामाजिक न्याय बनाम राष्ट्रीय एकता की बहस
ऐतिहासिक उद्धरण और संविधान की व्याख्या
7.2 मीडिया की भूमिका
प्रिंट मीडिया में तीखा विरोध
टीवी और अखबारों में शहरी दृष्टिकोण हावी
ग्रामीण और OBC पक्ष अपेक्षाकृत कम प्रतिनिधित्व
8. न्यायपालिका और संवैधानिक संकट
मण्डल निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई।
इंद्रा साहनी बनाम भारत सरकार (1992)
27% OBC आरक्षण वैध ठहराया गया
50% की सीमा तय की गई
क्रीमी लेयर की अवधारणा दी गई
➡️ इससे 1990 के राजनीतिक निर्णय को संवैधानिक आधार मिला।
9. मण्डल बनाम कमण्डल
1990 के दशक की राजनीति को अक्सर—
मण्डल (सामाजिक न्याय)
कमण्डल (धार्मिक राष्ट्रवाद)
के द्वंद्व के रूप में देखा जाता है।
इस द्वंद्व ने—
नई राजनीतिक पहचान बनाई
क्षेत्रीय दलों को मजबूती दी
राष्ट्रीय राजनीति की दिशा बदली
10. दीर्घकालिक प्रभाव
10.1 सत्ता संरचना में बदलाव
पिछड़े वर्गों का राजनीतिक उदय
बिहार, यूपी जैसे राज्यों में सामाजिक क्रांति
10.2 लोकतंत्र का विस्तार
संसद, नौकरशाही और शिक्षा में विविधता
सत्ता का विकेंद्रीकरण
निष्कर्ष
मण्डल आयोग रिपोर्ट का 1990 में कार्यान्वयन केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं था, बल्कि यह—
भारतीय लोकतंत्र के सामाजिक पुनर्गठन की घोषणा थी।
इसने असहज सवाल उठाए, तीखे संघर्ष पैदा किए, सरकार गिराई—लेकिन अंततः यह सिद्ध किया कि लोकतंत्र केवल मतदान नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व भी है।
1990 का राजनीतिक विस्फोट आज भी भारतीय राजनीति की धड़कन में सुनाई देता है—
कभी आरक्षण की बहस में,
कभी जाति जनगणना में,
और कभी सामाजिक न्याय के नए आंदोलनों में।
11. सुप्रीम कोर्ट और मण्डल केस
11.1 इंद्रा साहनी बनाम भारत सरकार (1992)
सुप्रीम कोर्ट ने—
27% OBC आरक्षण को वैध ठहराया
50% की सीमा तय की
क्रीमी लेयर की अवधारणा दी
यह फैसला मण्डल आयोग की संवैधानिक वैधता की मुहर था।
12. सामाजिक-राजनीतिक प्रभाव
12.1 राजनीति में पिछड़े वर्गों का उदय
लालू प्रसाद यादव
मुलायम सिंह यादव
नीतीश कुमार
12.2 सत्ता संरचना में बदलाव
क्षेत्रीय दलों का उभार
कांग्रेस और भाजपा की रणनीति में परिवर्तन
13. मण्डल आयोग: आलोचना और मूल्यांकन
13.1 आलोचनाएँ
जातिगत राजनीति को बढ़ावा
गुणवत्ता पर प्रभाव की आशंका
13.2 सकारात्मक मूल्यांकन
प्रतिनिधित्व में वृद्धि
लोकतंत्र का सामाजिक विस्तार
14. आज के संदर्भ में मण्डल आयोग
आज भी OBC आरक्षण, क्रीमी लेयर, जाति जनगणना और सामाजिक न्याय की बहस मण्डल आयोग की विरासत से जुड़ी हुई है।
निष्कर्ष
मण्डल आयोग केवल एक रिपोर्ट नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की आत्मा में दर्ज सामाजिक क्रांति है। इसने सत्ता, समाज और अवसरों के संतुलन को बदला। विरोध और समर्थन—दोनों के बीच—यह आयोग आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना अपने समय में था।
मण्डल आयोग ने भारत को यह सिखाया कि समानता का अर्थ सबको एक-सा नहीं, बल्कि सबको न्यायपूर्ण अवसर देना है।
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